जनता के हक़ की आवाज़ बने अधिवक्ता मानवेंद्र द्विवेदी: रीवा में दूषित पानी के ख़िलाफ़ अनोखा गांधीवादी विरोध
जनता के हक़ की आवाज़ बने अधिवक्ता मानवेंद्र द्विवेदी: रीवा में दूषित पानी के ख़िलाफ़ अनोखा गांधीवादी विरोध, समाज के लिए पेश की नज़ीर
(रीवा जिला न्यायालय के अधिवक्ता श्री मानवेंद्र द्विवेदी द्वारा जनसमस्याओं के समाधान हेतु गांधीवादी पहल)
“समस्याओं पर मौन साधने से समाधान नहीं मिलता, अधिकारों के लिए लोकतांत्रिक तरीक़े से आवाज़ उठाना ही एक सजग नागरिक का धर्म है।”
रीवा। अक्सर देखा जाता है कि लोग जनसमस्याओं पर केवल आपस में चर्चा करके या सोशल मीडिया पर निराशा ज़ाहिर कर शांत बैठ जाते हैं। लेकिन रीवा जिला न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता मानवेंद्र द्विवेदी ने यह साबित कर दिया कि हाथ पर हाथ धरे बैठने के बजाय यदि सजग नागरिक आगे आएं, तो व्यवस्था को जगाया जा सकता है। उन्होंने रीवा नगर निगम क्षेत्र में दूषित पेयजल की गंभीर समस्या को लेकर जिस शालीनता, साहस और दृढ़ता के साथ आवाज़ उठाई, उसकी पूरे शहर में सराहना हो रही है।
कमिश्नर आवास के बाहर भजन-कीर्तन कर जगाया प्रशासन
रीवा नगर निगम क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले नेहरू नगर, इंदिरा नगर, संजय नगर और अरुण नगर जैसे पॉश कॉलोनियों में लंबे समय से मलयुक्त और दूषित पेयजल की आपूर्ति हो रही थी। जनता प्रतिमाह ₹200 जलकर और भुगतान में थोड़ी भी देरी होने पर भारी अधिभार (सरचार्ज) चुका रही है, इसके बावजूद नागरिकों को पीने के लिए दूषित जल दिया जा रहा था।
इंदौर के भागीरथपुरा जैसी दूषित जल त्रासदी का स्मरण कराते हुए अधिवक्ता मानवेंद्र द्विवेदी ने स्थानीय नागरिकों के साथ मिलकर नगर निगम आयुक्त के आवास के बाहर बैठकर 'सीताराम संकीर्तन' शुरू किया। यह विरोध पूरी तरह अहिंसक, अनुशासित और गांधीवादी था। उनका स्पष्ट संदेश था कि यदि प्रशासन कुंभकर्णी नींद में सोया है, तो जनता लोकतांत्रिक तरीक़े से उसे जगाने का सामर्थ्य रखती है।
उनके इस साहसिक कदम से हमें क्या सीख मिलती है?
- अधिकारों के प्रति सजगता: जब नागरिक ईमानदारी से टैक्स और सरचार्ज चुकाते हैं, तो शुद्ध बुनियादी सुविधाओं की मांग करना कोई उपकार नहीं, बल्कि संवैधानिक अधिकार है।
- सकारात्मक व शांतिपूर्ण तरीक़ा: बिना किसी उपद्रव या तोड़-फोड़ के, शालीनता और संकीर्तन के ज़रिए अपनी बात शासन तक पहुंचाना विरोध का सर्वोत्तम लोकतांत्रिक माध्यम है।
- सामूहिक नेतृत्व की मिसाल: जनसमस्याओं पर व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठकर आगे आना और समाज की आवाज़ बनना ही एक ज़िम्मेदार नागरिक व अधिवक्ता की पहचान है।
समाज को ऐसे ही साहसी नेतृत्व की ज़रूरत है
जब तक समाज में ऐसे निर्भीक लोग आगे आकर समस्याओं के खिलाफ खड़े नहीं होंगे, तब तक ज़मीनी बदलाव संभव नहीं है। अधिवक्ता मानवेंद्र द्विवेदी का यह कदम रीवा ही नहीं, बल्कि हर सजग नागरिक के लिए एक प्रेरणा है। यदि कोई जनहित के लिए निस्वार्थ भाव से आगे आता है, तो हमारा दायित्व बनता है कि हम घर बैठकर तमाशा न देखें, बल्कि कंधे से कंधा मिलाकर उनका साथ दें और उन्हें प्रोत्साहित करें।